Friday, February 26, 2010

पहले पहले प्यार में



आँखों में फागुन की मस्ती
पलकों पर वासंती हलचल
मतवाला मन भीग रहा है बूँदों के त्यौहार में
शायद ऐसा ही होता है पहले पहले प्यार में।

पैरों की पायल छनकी कंगन खनका
हर आहट पर चौंक चौंक जाना मन का
साँसों का देहरी छूछूकर आ जाना
दर्पण का खुद दर्पण से ही शरमाना
और धडक़ना हर धडक़न का सपनों के संसार में।
शायद ऐसा ही होता है पहले पहले प्यार में।
भंग चढ़ाकर बौराया बादल डोले
नदिया में दो पाँव हिले हौलेहौले
पहलीपहली बार कोई नन्ही चिडिय़ा
अंबर में उडऩे को अपने पर तौले

हिचकोले खाती है नदिया मस्ती से मँझधार में।
शायद ऐसा ही होता है पहले पहले प्यार में।

जिन पैरों में उछला करता था बचपन
कैसी बात हुई कि बदल गया दर्पण
होता है उन्मुत अनोखा ये बंधन
रोमरोम पूजा साँसें चंदनचंदन
बिन माँगे सब कुछ मिल जाता आँखों के व्यापार में।
शायद ऐसा ही होता है पहलेपहले प्यार में।

Friday, February 19, 2010

फिर उठे सोए समन्दर में




तोड़कर चट्टान फूटे सैकड़ों झरने
टेसुओं में खिल गये दहके हुए अंगार
फिर उठे सोए समन्दर में महकती खुशबुओं के ज्वार



रंग उभरी कल्पनाओं में
घुल गया चन्दन हवाओं में
मिल गईं बेहोशियाँ आकर
होश की सारी दवाओं में



भावनाओं की उठी जयमाल के आगे
आज संयम सिर झुकाने को हुआ लाचार।



छू लिया जो रेशमी पल ने
बिजलियाँ जल में लगीं जलने
प्रश्न सारे कर दिए झूठे
दो गुलाबों के लिखे हल ने



तितलियों ने आज मौसम के इशारे पर
फूल की हर पाखुड़ी का कर दिया श्रृंगार।



लड़खड़ाई सांस की सरगम
गुनगुनाकर गीतगोविन्दम्
झिलमिलाकर झील के जल में
और उजली हो गई पूनम



रंग डाला फिर हठीले श्याम ने आकर
राधिका का हर बहाना हो गया बेकार।