Wednesday, June 9, 2010

विश्व विख्यात हास्य कवि सुरेन्द्र दुबे (जयपुर) से बातचीत


कवि सम्मेलनों की पहली, अकेली

और

सम्पूर्ण पत्रिका 'कवि सम्मेलन समाचार'

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प्रकाशन आरम्भ करते समय इस पत्रिका के प्रधान संपादक एवं विख्यात हास्य कवि सुरेन्द्र दुबे (जयपुर) से कवि सम्मेलनों की दशा और दिशा के बारे में विस्तृत बातचीत हुई। यह बातचीत कवि सम्मेलन विधा को समझने के लिए एक जरूरी दस्तावेज है। मैं यहाँ उसे उन तमाम रचनाकारों के लिए प्रकाशित कर रही हूँ, जो कवि सम्मेलन विधा में रुचि रखते हैं तथा उसकी बारीकियों को समझना चाहते हैं।

लोग कहते हैं कि कवि सम्मेलन पतनोन्मुख है। क्या सचमुच ऐसा है?

किसने कहा कि कवि सम्मेलन पतनोन्मुख है? कवि सम्मेलनों की संख्या बढ़ी है, बजट बढ़ा है, कवियों को प्राप्त होने वाला मानदेय बढ़ा है। मंच की साज-सज्जा बेहतर हुई है। कवियों के ठहरने की व्यवस्था पाँच सितारा श्रेणी की होती जा रही है। कल तक जो कवि बसों में सफर किया करते थे अब लगातार हवाई यात्राएँ कर रहे हैं। फिर यह मानने के पीछे कोई तर्कसम्मत कारण नहीं है कि कवि सम्मेलन पतनोन्मुख हैं। दरअसल कवि सम्मेलन तो अपने ऐतिहासिक उत्थान और उत्कर्ष के दौर में है।

लेकिन ख्यातनाम साहित्यकारों की तो आम राय यही है कि अब कवि सम्मेलन पतनोन्मुख हैं।

साहित्यकारों के साथ प्रॉब्लम यह है कि वे कविता के बारे में तो बहुत कुछ जानते हैं लेकिन कवि सम्मेलनों के बारे में उतना नहीं जानते। वे एक तरह से कविता और कवि सम्मेलन को एक दूसरे का पर्यायवाची मानकर बात करते हैं। इस बारे में वे इतने कन्फ्यूज्ड है कि कवि सम्मेलन पर बात करते-करते तो कविता पर बात करने लगते हैं और कविता पर बात करते-करते अचानक कवि सम्मेलन पर बोलने लगते हैं। असलियत यह है कि कवि सम्मेलन में तो कविता भी होती है लेकिन कविता में कभी कवि सम्मेलन नहीं हो सकता। लोग जब तक कविता और कवि सम्मेलनों को अलग-अलग नजरिये से नहीं देखेंगे और दोनों को अलग-अलग कसौटियों पर नहीं कसेंगे तब तक उनका कन्फ्यूजन बना रहेगा। और वे सही नतीजे तक नहीं पहुंच सकेंगे।

जो लोग कवि सम्मेलनों में सक्रिय हैं प्राय: कविता और कवि सम्मेलन को अलग-अलग नजरिये से देखते रहे हैं। फिर कई बार खुद हमें भी ऐसा क्यों लगता है कि कवि सम्मेलनों का स्तर गिर रहा है?

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कवि सम्मेलनों में कविता का अनुपात कम हो रहा है। न केवल कविता की मात्रा कम हुई है बल्कि कविता के स्तर में भी गिरावट आई है, जबकि कविता कवि सम्मेलन की आत्मा है। आत्मा के न रहने पर शरीर मर जाता है वैसे ही कविता की गैर मौजूदगी से कवि सम्मेलन मर जायेंगे। ऐसे में कवि सम्मेलनों में कविता की मात्रा और स्तर की गिरावट पर स्तरीय कवियों, कवयित्रियों, श्रोताओं तथा साहित्यकारों का चिन्तित होना स्वाभाविक है।

लेकिन जब कवि सम्मेलनों में घटिया कवि की घटिया कविता जम जाये और बढिय़ा कवि की बढिय़ा कविता हूट हो जाए तो क्या यह कवि सम्मेलनों के स्तर में गिरावट का सबूत नहीं है?

नि:सन्देह यह उस कवि सम्मेलन के स्तर में गिरावट का सबूत तो है लेकिन यहाँ यह भी समझ लेना जरूरी है कि वहाँ घटिया कवि की घटिया कविता की बढिय़ा प्रस्तुति जम रही है तथा बढिय़ा कवि की बढिय़ा कविता की घटिया प्रस्तुति हूट हो रही है। यह बात तो सभी को समझनी ही चाहिये कि कवि सम्मेलन में कविता की परफोरमेंस का भी बहुत महत्व है।
हमारे बढिय़ा कहे जाने वाले कवि इस स्थिति के कारण यह धारणा बना लेते हैं कि मंच पर तो घटिया कविताएँ ही जमती हैं। घटिया कवियों ने श्रोताओं का टेस्ट भी घटिया कर दिया है। ऐसी गलत धारणा बनाकर कई बार बढिय़ा कवि भी अपने काव्य पाठ के लिये अपनी ऐसी रचना का चयन करने की गलती कर बैठते हैं जो घटिया कवि की घटिया कविताओं से भी घटिया होती है। ऐसे में अगर उन्हें हूट होना पड़े तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?
अगर कवि सम्मेलन में रंग जमाना है तो आप सिर्फ अच्छी कविता लिखकर संतुष्ट नहीं हो सकते। आपको उस अच्छी कविता के अच्छे प्रस्तुतीकरण के लिये भी बाकायदा मेहनत करनी पड़ेगी और कवि सम्मेलन में काव्य पाठ की विविध दशाओं पर अपनी व्यावहारिक समझ बनानी ही पड़ेगी।

लेकिन फिर भी कवि सम्मेलनों में घटिया कवि के महिमा मंडित होने तथा बढिय़ा कवि के अपमानित होने के पाप की जिम्मेदारी किसी को तो लेनी ही होगी!

अगर यह घटना पाप की श्रेणी में आती है तो उसके लिये जिम्मेदार वह तथाकथित कवि ही है जिसने बढिय़ा कविता को घटिया तरीके से प्रस्तुत किया है, यह जानते हुये भी कि मंच पर काव्य पाठ की सफलता में प्रस्तुतीकरण की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है। आप इसे यों समझ सकते हैं कि कवि सम्मेलन एक दीपक है जिसमें श्रोता तेल है और कवि बाती की तरह है। बाती की लौ कविता है। अगर कभी बाती ही लौ का वजन वहन नहीं कर सके तथा तेल में गिरकर बुझ जाये तो इसमें कसूर किसका है? तेल तो है ही इसलिए कि बाती अधिक देर तक लौ देती रहे। इसके लिए तेल खुद को बाती के साथ-साथ जलाता रहता है। फिर तेल का क्या कसूर? कसूर तो बाती का है जो पूरे संतुलन के साथ खड़े न रहकर अपनी ही लौ का वजन नहीं झेल पाई। हाँ कभी कभार हवा का तेज झोंका भी बाती को बुझा देता है लेकिन यह और बात है। फिर भी मजबूती और संतुलन के साथ तेल में खड़े रहने की जिम्मेदारी से कोई बाती बच नहीं सकती।