Saturday, May 8, 2010

जब भी मन की माला फेरी

जब भी मन की माला फेरी
मर्यादा ने आँख तरेरी
परम्परा के लश्कर जागे
गूँजी अम्बर तक रणभेरी

जिनको है स्वीकार सदा से
तालाबों में घिरकर जीना
वो क्या जाने क्या होता है
झरनों का पावन जल पीना?
आँखों में आकाश सजाना
बाहों में बादल भर लेना
कस्तूरी के लिए भटक कर
खुद को ही पागल कर लेना

सूरज के संग जगने-सोने
वाले कैसे जान सकेंगे
मतवालों की इस महफिल में
कैसी जल्दी कैसी देरी?

जो देखा है सूरदास ने
आँखों वाले क्या देखेंगे?
जो महसूस किया मीरा ने
ज्ञानी-ध्यानी क्या सोचेंगे?
दीवानों की इस बस्ती में
कैसा पाना, कैसा खोना?
आसमान की चादर ओढ़ी
धरती का कर लिया बिछौना

जिसने अपने को पहचाना
जिसको मन का मिला खजाना
दुनिया भर की दौलत
उसके आगे है मिट्टी की ढेरी

ईश्वर की आँखों से छलके
होंगे सूरज-चँदा-तारे
मुस्कानों के पीछे छिपकर
बैठे हैं दो आँसू खारे
स्वर्ण पत्र पर खुदवाई
कितनों ने अपनी यश गाथाएँ
कालजयी होने की धुन में
बदली सारी परिभाषाएँ

पर वो ही जीवित रह पाया
जिसने आँसू को दोहराया
या फिर मन के भोजपत्र पर
मन की सच्ची पीर उकेरी

2 comments:

  1. वाह !!!
    कीर्त्ति जी . अति सुन्दर रचना ।

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