Friday, February 19, 2010

फिर उठे सोए समन्दर में




तोड़कर चट्टान फूटे सैकड़ों झरने
टेसुओं में खिल गये दहके हुए अंगार
फिर उठे सोए समन्दर में महकती खुशबुओं के ज्वार



रंग उभरी कल्पनाओं में
घुल गया चन्दन हवाओं में
मिल गईं बेहोशियाँ आकर
होश की सारी दवाओं में



भावनाओं की उठी जयमाल के आगे
आज संयम सिर झुकाने को हुआ लाचार।



छू लिया जो रेशमी पल ने
बिजलियाँ जल में लगीं जलने
प्रश्न सारे कर दिए झूठे
दो गुलाबों के लिखे हल ने



तितलियों ने आज मौसम के इशारे पर
फूल की हर पाखुड़ी का कर दिया श्रृंगार।



लड़खड़ाई सांस की सरगम
गुनगुनाकर गीतगोविन्दम्
झिलमिलाकर झील के जल में
और उजली हो गई पूनम



रंग डाला फिर हठीले श्याम ने आकर
राधिका का हर बहाना हो गया बेकार।

3 comments:

  1. वाह...छू लिया जो रेशमी पल ने
    बिजलियाँ जल में लगीं जलने
    बहुत ही सुंदर भाव और शब्दों का अनूठा प्रयोग

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  2. great mam keep it up and up it was very nice that u r promoting hindi in web based applications

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